आज की खबर: 9 में से 1 भारतीय है इन्फेक्शियस डिजीज से पीड़ित, ICMR की रिपोर्ट ने बढ़ाई टेंशन
Covid-19 Infection: आज भी दुनिया कोविड महामारी से पूरी तरह उबर नहीं पाई है. अब इसको लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. दरअसल साइंटिस्ट ने लॉन्ग कोविड मरीजों के खून में ऐसे छोटे-छोटे थक्के और इम्यून सिस्टम से जुड़े बदलाव पाए हैं, जो इस लंबे समय तक रहने वाली स्थिति का कारण बन सकते हैं और भविष्य के इलाज का रास्ता भी खोल सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर लोग कोविड-19 इंफेक्शन से कुछ दिनों की सर्दी, गले में दर्द, खांसी या बुखार के बाद पूरी तरह ठीक हो जाते हैं. लेकिन कई मरीज ऐसे हैं जिन्हें थकान, ब्रेन फॉग, शरीर दर्द और सांस फूलने जैसी समस्याएं लंबे समय तक परेशान करती हैं. इसे ही लॉन्ग कोविड कहा जाता है. इन लक्षणों के पीछे की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं थी. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर अब साइंटिस्ट को क्या मिला है. रिसर्च में क्या निकला? अब साइंटिस्ट ने लॉन्ग कोविड मरीजों में दो महत्वपूर्ण बदलावों की पहचान की है, खून में मौजूद माइक्रोक्लॉट्स और इम्यून सेल्स न्यूट्रोफिल में होने वाले परिवर्तन. माइक्रोक्लॉट्स खून में घूमने वाले क्लॉटिंग प्रोटीन के असाधारण गुच्छे होते हैं, जिन्हें सबसे पहले कोविड मरीजों के सैंपल में देखा गया था. रिसर्च में यह भी पाया गया कि लॉन्ग कोविड मरीजों में न्यूट्रोफिल नाम की व्हाइट ब्लड सेल्स एक खास बदलाव से गुजरती हैं. यह बदलाव इन्हें अपना डीएनए बाहर निकालकर धागेनुमा संरचनाएं बनाने के लिए आगे बढ़ाने का काम करता है. इन्हें न्यूट्रोफिल एक्स्ट्रासेल्युलर ट्रैप्स कहा जाता है, जो इंफेक्शन को खोजकर नष्ट करने में मदद करते हैं. एक्सपर्ट का क्या कहना है? साइंटिस्ट का मानना है कि कुछ कोविड मरीजों में माइक्रोक्लॉट्स और NETs के बीच होने वाला यह इंटरैक्शन शरीर में ऐसी प्रतिक्रियाओं की सीरीज शुरू कर देता है, जो आखिरी में लॉन्ग कोविड का कारण बन सकती है. माना जाता है कि माइक्रोक्लॉट्स NETs को अत्यधिक बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे सूजन और खून के थक्कों से जुड़ी समस्याएं बढ़ती हैं और कोविड जैसे लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं. लॉन्ग कोविड मरीजों के प्लाज्मा की स्ट्रक्चरल जांच में माइक्रोक्लॉट्स और NETs की मात्रा स्वस्थ लोगों की तुलना में काफी अधिक पाई गई. स्टडी में यह भी सामने आया कि मरीजों के माइक्रोक्लॉट्स आकार में भी बड़े थे. स्टडी के राइटर एलैन थिएरी के अनुसार, “यह खोज बताती है कि माइक्रोक्लॉट्स और NETs के बीच कुछ ऐसी शारीरिक प्रोसेस चल रही हैं, जो कंट्रोल से बाहर होकर रोग की वजह बन सकती हैं.” रिसर्चर रिसिया प्रिटोरियस ने बताया कि यह इंटरैक्शन माइक्रोक्लॉट्स को शरीर की प्राकृतिक क्लॉट ब्रेकिंग प्रक्रिया से बचा सकता है, जिससे वे लंबे समय तक खून में बने रहते हैं और रक्त वाहिकाओं से संबंधित समस्याएं पैदा कर सकते हैं. Journal of Medical Virology में पब्लिश स्टडी में साइंटिस्ट ने बताया कि NETs का अत्यधिक निर्माण माइक्रोक्लॉट्स को और अधिक स्थिर बनाता है, जो लॉन्ग कोविड के लक्षणों में योगदान दे सकता है. रिसर्च टीम का कहना है कि यह खोज लॉन्ग कोविड को समझने के लिए एक मौका देने का काम करने…
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